रक्षाबंधन का महत्व व कथाए

रक्षाबंधन का महत्व व कथाए

रक्षाबंधन का महत्व व कथाए

 रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है 

भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के पवित्र बंधन का त्योहार है, जो हर साल सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं और भाई उनकी रक्षा का वचन देते हैं।

 

मुख्य कारण और महत्व

 

यह पर्व रिश्तों में स्नेह और अपनापन गहरा करता है। 

 

भाई अपनी बहन को जीवनभर सुरक्षित रखने का संकल्प लेते हैं।

 

यह केवल खून के रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में सुरक्षा और स्नेह के हर भाव को सम्मान देता है।

 

रक्षाबंधन का महत्व

 

भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करता है।

रक्षा, प्रेम और विश्वास का संदेश देता है।

परिवार में एकता और स्नेह बढ़ाता है।

धार्मिक रूप से रक्षा-सूत्र को शुभ और मंगलकारी माना जाता है।

 

रक्षाबंधन हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। यह भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और रक्षा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा तथा सम्मान का वचन देता है।

रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है?

इसके पीछे कई धार्मिक कथाएँ प्रचलित हैं:

 

इंद्र और शची (इंद्राणी): भविष्य पुराण के अनुसार देवताओं और असुरों के युद्ध में इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था, जिससे उन्हें विजय मिली।

 

श्रीकृष्ण और द्रौपदी: जब श्रीकृष्ण की उंगली कट गई, तो द्रौपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा बांध दिया। बदले में कृष्ण ने उसकी रक्षा का वचन निभाया।

 

रानी कर्णावती और हुमायूं: लोककथा के अनुसार रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की प्रार्थना की थी।

 

शास्त्रों में रक्षा-सूत्र बांधते समय मंत्र

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

अर्थ: जिस रक्षा-सूत्र से महाबली राजा बलि को बांधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बांधता हूं; हे रक्षा-सूत्र, तुम अटल रहो और रक्षा करो।

 शुभ मुहूर्त (रक्षाबंधन)

 

रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार भद्रा काल में राखी नहीं बाँधनी चाहिए। इसलिए भद्रा समाप्त होने के बाद राखी बाँधना शुभ माना जाता है। यदि पूर्णिमा पूरे दिन रहे और भद्रा न हो, तो सुबह से दोपहर तक का समय भी शुभ माना जाता है।

 

राखी बाँधने की पूजा विधि

 

पूजा की थाली में रखें: राखी, रोली (कुमकुम), अक्षत (चावल), दीपक, मिठाई और नारियल 

1.भगवान गणेश और अपने इष्टदेव का स्मरण करें।

2.भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाएँ।

3.भाई के माथे पर रोली का तिलक लगाएँ।

4.तिलक पर अक्षत लगाएँ।

5.दाहिनी कलाई पर राखी बाँधें।

6.राखी बाँधते समय यह मंत्र बोलें:

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

7.भाई की आरती करें और मिठाई खिलाएँ।

8.भाई बहन को उपहार देकर उसकी रक्षा और सम्मान का संकल्प ले।

 

कुछ शास्त्रीय नियम

 

भद्रा काल में राखी न बाँधें।

 

राखी हमेशा दाहिने हाथ की कलाई पर बाँधी जाती है।

 

पूजा के समय दीपक जलाना शुभ माना जाता है।

 

राखी बाँधने के बाद बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना मंगलकारी होता है।

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